इंदिरा का चुनाव रद्द कराने वाले जस्टिस का परिवार कहां?: छोटा बेटा जज तो बड़ा वकील; बोले- पिता ने बिना डरे फैसला सुनाया था – Lucknow News

 

तारीख- 12 जून, 1975, स्थान…इलाहाबाद हाईकोर्ट की कोर्ट नंबर 24। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ रायबरेली से प्रतिद्वंद्वी प्रत्याशी रहे राजनारायण राय की याचिका पर फैसले का दिन। जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए इंदिरा ग

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फैसला आते ही देश में हलचल मच गई, देश में राजनीतिक संकट खड़ा हो गया। इस फैसले ने इंदिरा गांधी के खिलाफ जयप्रकाश नारायण के आंदोलन को मजबूती दी। ऐसा माना जाता है कि इंदिरा गांधी ने इसी वजह से 25 जून, 2025 को देश में आपातकाल की घोषणा कर दी।

आपातकाल के 50 वर्ष पूरे हो गए हैं। ‘दैनिक भास्कर’ डिजिटल ने इलाहाबाद में जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा के परिवार से मिलकर उस समय की स्थिति और उसके बाद की परिस्थितियों को जानने का प्रयास किया। पढ़िए खास रिपोर्ट…

तस्वीर जस्टिस जगमोहन लाल ने ऐतिहासिक फैसला दिया था।

तस्वीर जस्टिस जगमोहन लाल ने ऐतिहासिक फैसला दिया था।

फैसले के बाद भी सामान्य थे जस्टिस सिन्हा जस्टिस जगमोहन लाल के छोटे बेटे विपिन सिन्हा 2014 से 2020 तक इलाहाबाद हाईकोर्ट में जज रहे हैं। ‘दैनिक भास्कर’ से बातचीत में जस्टिस विपिन बताते हैं- पिता ने उस फैसले को कभी अहंकार या गर्व के रूप में नहीं लिया, बल्कि एक सामान्य निर्णय के रूप में ही देखा।

आज के दौर में जब न्यायाधीशों पर तरह-तरह के आरोप लगते हैं, लेकिन परिवार के किसी भी सदस्य ने न तो उस फैसले से किसी भी तरह का लाभ लिया, न ही किसी भी राजनीतिक दल ने उन्हें कोई लाभ दिया। हां, परिवार को आज भी गर्व है कि उनके पिता ने मेरिट के आधार पर इतना बड़ा जजमेंट दिया, जो आज भी मिसाल है।

ये जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा के बेटे जस्टिस विपिन सिन्हा (बाएं से पहले) और एडवोकेट नवीन सिन्हा हैं।

ये जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा के बेटे जस्टिस विपिन सिन्हा (बाएं से पहले) और एडवोकेट नवीन सिन्हा हैं।

पढ़िए पूरी बातचीत

सवाल: क्या जस्टिस जगमोहन लाल ने परिवार को कभी बताया कि किस स्थिति में वह जजमेंट दिया था?

विपिन सिन्हा: उस जजमेंट को उन्होंने कभी परिवार में डिस्कस नहीं किया था। कभी नहीं बताया कि किस परिस्थिति में वह जजमेंट दिया। वैसे भी उस समय बच्चों को यह अलाउ नहीं था कि वह पेरेंट्स के काम में दखल दें।

सवाल: क्या जजमेंट को लेकर उन्हें गर्व था?

विपिन सिन्हा: उन्होंने जजमेंट को लेकर खास अहमियत नहीं दी थी।

सवाल: क्या आज के माहौल में वैसे फैसले आना संभव है?

विपिन सिन्हा: यह कहना मुश्किल है कि आज के माहौल में वैसा जजमेंट आ सकता है या नहीं। वह एक जज पर निर्भर करता है कि वह लॉ के अनुसार क्या निर्णय करते हैं। उस जजमेंट से न्यायपालिका में फर्क नहीं आया था, लेकिन जनता में असर था।

एडवांटेज की नीयत से जजमेंट नहीं दिया: नवीन सिन्हा हमने जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा के बड़े बेटे एडवोकेट नवीन सिन्हा से भी बात की। नवीन सिन्हा ने कहा, ऐसा नहीं था कि किसी एडवांटेज की नीयत से वह जजमेंट दिया गया हो।

सवाल: उस जजमेंट का परिवार पर क्या असर था?

नवीन सिन्हा: उस जजमेंट का राजनीतिक प्रभाव तो अलग था। उसमें राजनेता शामिल थे, इसलिए राजनीतिक प्रभाव भी था। लेकिन व्यक्तिगत कोई असर नहीं था। पिता के कामकाज और उनके व्यक्तिगत जीवन पर भी कोई असर नहीं था।

सवाल: क्या उस समय आपके परिवार की सुरक्षा को खतरा था?

नवीन सिन्हा: हमारे परिवार की सुरक्षा को कोई खतरा नहीं था। हमें न कोई सुरक्षा दी गई, न ही हमने कोई सुरक्षा मांगी। किसी प्रकार का कोई विरोध प्रदर्शन नहीं था।

सवाल : क्या जजमेंट किसी दबाव में था ?

नवीन सिन्हा: यदि जजमेंट किसी राजनीतिक रूप से मोटिवेडेट होता तो हम लोगों को बेनिफिट हुआ होता। लेकिन जस्टिस जगमोहन लाल या परिवार में से कोई भी इस फैसले के आधार पर लाभार्थी नहीं रहे।

सवाल: उस जजमेंट से कोई नुकसान हुआ क्या?

नवीन सिन्हा: उस जजमेंट से कोई नुकसान या बेनिफिट होने का सवाल नहीं उठता। क्योंकि वह जजमेंट किसी मोटिव से नहीं दिया गया था। हालांकि लोगों ने कहा कि पॉलिटिकल मोटिव था, जिसके कारण जजमेंट दिया गया। लेकिन बाद में अपने-आप ये बात गलत साबित होती है कि किसी भी पार्टी ने हमारा नुकसान नहीं किया, न किसी ने फायदा दिया। हमारे परिवार ने कभी फायदा उठाने की कोशिश भी नहीं की।

सवाल: आपातकाल लागू होने की वजह बना था वह जजमेंट?

नवीन सिन्हा: वह जजमेंट आपातकाल लागू होने की एक वजह हो सकता है, लेकिन पूरी तरह एक ही कारण नहीं था। उस समय जेपी आंदोलन भी इंदिरा गांधी के खिलाफ चल रहा था।

सवाल: आपको उस जजमेंट को लेकर कैसा फील होता है?

नवीन सिन्हा: हमें कुछ खास महसूस नहीं होता है, क्योंकि हमें कभी यह फील नहीं कराया गया कि उन्होंने कोई विशेष कार्य किया।

सवाल: क्या आपको उस फैसले पर गर्व होता है?

नवीन सिन्हा: हां, हमें गर्व होता कि हमारे पिताजी ने ईमानदारी से बिना भयभीत हुए यह काम किया, यह गर्व की बात है।

सवाल: न्यायपालिका के उस समय और आज के समय में क्या अंतर है?

नवीन सिन्हा: मेरे ख्याल में कोई अंतर नहीं है। यदि समय आएगा तो फिर से ऐसा निर्णय लिया जा सकता है। जितना समय में फर्क आया है, उतना ही न्यायपालिका में भी अंतर आया है। क्योंकि न्यायपालिका भी समाज का हिस्सा है।

इंदिरा गांधी की जीत को अवैध करार दिया 1971 में रायबरेली के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी ने जीत हासिल की थी। उनकी जीत को उनके प्रतिद्वंद्वी राजनारायण ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। ‘इंदिरा गांधी बनाम राजनारायण’ केस में 1975 AIR 865, 1975 SCR (3) 333 के तहत चार साल तक सुनवाई के बाद 12 जून 1975 को फैसला सुनाया गया था। इंदिरा गांधी की जीत को अवैध करार देते हुए उनके चुनाव लड़ने पर छह साल के लिए रोक लगा दी गई।

तस्वीर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की है। राजनारायण की याचिका पर इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध घोषित किया गया था।

तस्वीर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की है। राजनारायण की याचिका पर इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध घोषित किया गया था।

जब फैसले से पहले घोषणा हुई- कोई ताली नहीं बजाएगा… जगमोहन लाल सिन्हा ने 9 बजकर 55 मिनट पर कमरा नंबर 24 में प्रवेश किया। जैसे ही आसन पर बैठे, पेशकार ने घोषणा की, ‘भाइयों और बहनों, राजनारायण की याचिका पर जब जज साहब फैसला सुनाएं तो कोई ताली नहीं बजाएगा।’ लेकिन जस्टिस ने जैसे ही फैसला सुनाया कोर्ट रूम तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।

ये इलाहाबाद हाईकोर्ट का रूम नंबर 24 है। इसी जगह पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया गया था।

ये इलाहाबाद हाईकोर्ट का रूम नंबर 24 है। इसी जगह पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया गया था।

जस्टिस सिन्हा ने लोगों से मिलना बंद कर दिया था राजनारायण बनाम सरकार मुकदमे में राज नारायण के वकील शांति भूषण के बेटे प्रशांत भूषण अपनी किताब ‘द केस दैट शुक इंडिया’ में लिखते हैं, ‘सिन्हा अपना फैसला सुकून के माहौल में लिखना चाहते थे। लेकिन जैसे ही अदालत बंद होती, उनके यहां इलाहाबाद के एक कांग्रेस संसद सदस्य रोज-रोज आने लगे।

उन्होंने लिखा है, ‘इस पर सिन्हा बहुत नाराज हुए और उन्हें उनसे कहना पड़ा कि वो उनके यहां न आएं। लेकिन जब वो इस पर भी नहीं माने तो सिन्हा ने अपने पड़ोसी जस्टिस पारिख से कहा कि वो उन साहब को समझाएं कि वो उन्हें परेशान न करें।’

प्रशांत भूषण ने लिखा है, ‘जब इसका भी कोई असर नहीं हुआ तो सिन्हा अपने ही घर में ‘गायब’ हो गए और कई दिनों तक अपने घर के बरामदे तक में नहीं देखे गए। उनके यहां आने वाले हर शख्स से कहा गया कि वो उज्जैन गए हुए हैं, जहां उनके भाई रहा करते थे।’

राजनारायण के वकील शांति भूषण के बेटे प्रशांत भूषण ने अपनी किताब में कई किस्सों का जिक्र किया है।

राजनारायण के वकील शांति भूषण के बेटे प्रशांत भूषण ने अपनी किताब में कई किस्सों का जिक्र किया है।

उन्होंने लिखा है, ‘इस बीच उन्होंने एक फोन कॉल तक नहीं रिसीव किया…इस तरह 28 मई से 7 जून, 1975 तक कोई, यहां तक कि उनके नजदीकी दोस्त तक उनसे नहीं मिल सके।’

किसी को भनक नहीं लगने दी राजनारायण के वकील रहे शांति भूषण अपनी आत्मकथा ‘कोर्टिंग डेस्टिनी’ में लिखते हैं, ‘जब मैंने बहस शुरू की तो मुझे लगा कि जज इस मुकदमे को कोई खास महत्व नहीं दे रहे हैं। लेकिन तीसरे दिन के बाद से मैंने नोट किया कि उन पर मेरी दलीलों का असर होने लगा है और वो नोट्स लेने लगे हैं।’

अपना फैसला सुनाने से पहले उन्होंने अपने निजी सचिव मन्ना लाल से कहा, ‘मैं नहीं चाहता कि आप ये फैसला सुनाने से पहले किसी को इसकी भनक भी लगने दें, यहां तक कि अपनी पत्नी को भी नहीं। ये एक बड़ी जिम्मेदारी है। क्या आप इसे उठाने के लिए तैयार हैं?’ निजी सचिव ने जस्टिस सिन्हा को भरोसा दिलवाया कि वो इस बारे में आश्वस्त रहें।

जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने फैसले से पहले अपने करीबियों से मिलना छोड़ दिया था।

जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने फैसले से पहले अपने करीबियों से मिलना छोड़ दिया था।

सुप्रीम कोर्ट जज बनाने का लालच तक दिया गया शांतिभूषण ने अपनी किताब में लिखा है कि ‘न्यायमूर्ति सिन्हा गोल्फ खेलने के शौकीन थे। एक बार गोल्फ खेलते हुए उन्होंने मुझे एक किस्सा बताया था। जब ये याचिका सुनी जा रही थी, तो जस्टिस डीएस माथुर इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश हुआ करते थे।’

उन्होंने लिखा है, ‘वो मेरे घर पहले कभी नहीं आए थे। लेकिन जब इस केस की बहस अपने चरम पर थी, तो एक दिन वो मेरे यहां पत्नी समेत आ पहुंचे। जस्टिस माथुर इंदिरा गांधी के उस समय के निजी डॉक्टर केपी माथुर के निकट संबंधी थे।’

शांतिभूषण की किताब के मुताबिक, ‘उन्होंने मुझे सोर्स न पूछे जाने की शर्त पर बताया कि उन्हें पता चला है कि सुप्रीम कोर्ट के जज के लिए मेरे नाम पर विचार हो रहा है। जैसे ही ये फैसला आएगा, आपको सुप्रीम कोर्ट का जज बना दिया जाएगा। मैंने उनसे कुछ भी नहीं कहा।’

निजी सचिव को डराया-धमकाया गया प्रशांत भूषण ने लिखा है कि ‘बहलाने-फुसलाने के बाद भी जब मन्ना लाल कुछ बताने के लिए तैयार नहीं हुए तो सीआईडी वालों ने उन्हें धमकाया, ‘हम लोग आधे घंटे में फिर वापस आएंगे। हमें फैसला बता दो, नहीं तो तुम्हें पता है कि तुम्हारे लिए अच्छा क्या है।’

मन्ना लाल ने तुरंत अपने बीबी बच्चों को अपने रिश्तेदारों के यहां भेजा और जस्टिस सिन्हा के घर में जाकर शरण ले ली। उस रात तो मन्ना लाल बच गए, लेकिन जब अगली सुबह वो तैयार होने के लिए अपने घर पहुंचे, तो सीआईडी की कारों का एक काफिला उनके घर के सामने रुका।’

इलाहाबाद हाईकोर्ट के रूम नंबर 24 का नंबर अब 34 हो गया है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के रूम नंबर 24 का नंबर अब 34 हो गया है।

प्रशांत भूषण ने लिखा है कि ‘उन्होंने फिर मन्ना लाल से फैसले के बारे में पूछा और यहां तक कहा कि इंदिरा गांधी खुद हॉटलाइन पर हैं। आप उन्हें खुद फैसले की जानकारी दे सकते हैं। मन्ना लाल ने कहा कि उन्हें देर हो रही है। वो फिर जस्टिस सिन्हा के घर पहुंच गए।’

प्रशांत भूषण ने आगे लिखा, ‘मन्ना लाल की परेशानी यहीं खत्म नहीं हुई। फैसला आने के बहुत दिनों बाद तक सीआईडी वाले उनसे पूछते रहे कि जून में जस्टिस सिन्हा से मिलने कौन-कौन आया करता था? वो ये भी जानना चाहते थे कि जस्टिस सिन्हा की जीवनशैली में हाल में कोई बदलाव हुआ है या नहीं।’

हिमाचल के चीफ जस्टिस बनने से किया इनकार शांति भूषण लिखते हैं, ‘जस्टिस सिन्हा का तबादला हिमाचल प्रदेश करने की तैयारी थी, ताकि वहां जब कोई पद खाली हो तो वो वहां के मुख्य न्यायाधीश बन सकें। जब उन तक ये पेशकश पहुंचाई गई तो उन्होंने विनम्रतापूर्वक उसे अस्वीकार कर दिया। वो बहुत महत्वाकांक्षी व्यक्ति नहीं थे और इस बात से ही संतुष्ट थे कि उन्हें सिर्फ एक ईमानदार और काबिल शख्स के रूप में याद किया जाए।

करियर पर नजर: अलीगढ़ और बरेली से पढ़ाई, 1972 में बने स्थायी जज जगमोहन लाल सिन्हा ने राजकीय हाई स्कूल अलीगढ़ से स्कूली शिक्षा प्राप्त की। बरेली कॉलेज से स्नातक करने के बाद मेरठ काॅलेज से लॉ की डिग्री प्राप्त की। 1943 से 1955 तक बरेली में वकालत की।

तस्वीर में जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा (बाएं से दूसरे) अपने माता-पिता और बीवी-बच्चों के साथ हैं।

तस्वीर में जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा (बाएं से दूसरे) अपने माता-पिता और बीवी-बच्चों के साथ हैं।

3 जून, 1957 तक बरेली में जिला सरकार के सलाहकार (आपराधिक) के रूप में कार्य किया। उसके बाद सिविल एवं सेशन मजिस्ट्रेट के रूप में काम किया। फिर अतिरिक्त जिला जज और जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में सेवाएं दी। 3 जनवरी, 1970 को उन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट का न्यायधीश नियुक्त किया गया। अगस्त 1972 को वे स्थायी न्यायाधीश नियुक्त हुए।

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25 जून, 1975… यह वो दिन है, जिसे काले अध्याय के रूप में याद किया जाता है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लागू कर दी थी। उस दौर के बड़े-बड़े नेताओं को सलाखों के पीछे डाल दिया गया था। उन्हीं में से एक थे राज नारायण। उन्होंने इमरजेंसी के बाद हुए चुनाव में देश की उस समय की सबसे ताकतवर नेता और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को रायबरेली सीट से चुनाव हरा दिया था।

कौन थे राजनारायण? उनके गांव की अब स्थिति क्या है? उनके परिवार में कौन-कौन है? यह सब जानने के लिए दैनिक भास्कर राजनारायण के वाराणसी स्थित गांव मोतीकोट पहुंचा। पढ़िए पूरी खबर…

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