राहुल की सदस्यता रद्द, विपक्षी एकता को नई ऊर्जा

देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा इस मुद्दे को आने वाले लोकसभा चुनाव तक जीवित रहने देती है या फिर ये मुद्दा दम तोड़ देता है? साथ ही बदले समीकरण को कैसे साधेगी भाजपा?  

राम प्रकाश राय│ शुक्रवार को कांग्रेस नेता राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता रद्द कर दी गई. एक दिन पहले गुरुवार को सूरत की कोर्ट ने कांग्रेस नेता को मानहानि के एक मामले में दो साल की सजा सुनाई. जिसके बाद से ही ये कयास लगाया जाने लगा कि राहुल गाँधी की सदस्यता रद्द की जा सकती है. हुआ भी यही. गर्म कयासों पर दोपहर में मुहर लग गई. आखिरकार राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता रद्द हो गई. केरल के वायनाड से सांसद राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता रद्द होने के बाद सीट रिक्त घोषित कर दी गई. लोकसभा सचिव ने इस सम्बन्ध में नोटिफिकेशन जारी किया. इतना ही नहीं बतौर सांसद राहुल गाँधी को मिले 12 तुगलक लेन सरकारी आवास को खाली कराये जाने का नोटिस भी लगे हाथ दे दिया गया.

बताते चलें कि गुरुवार को मानहानि के मामले में राहुल गाँधी को दो साल की सजा सुनाई थी. कोर्ट ने सजा देने के बाद उसपर 30 दिनों के लिए रोक लगा दी थी. राहुल गाँधी को अपील करने के लिए 30 दिनों का समय दिया गया था. सूरत कोर्ट में राहुल गाँधी के ऊपर चल रहा मानहानि का ये मामला 2019 के लोकसभा चुनाव के समय का था. चुनाव के दौरान राहुल गाँधी ने कहा था कि ‘ हर चोर का उपनाम मोदी ही क्यों होता है..?’ उनके इस बयान के बाद सूरत की कोर्ट में इस सम्बन्ध में मानहानि का मुकदमा दर्ज करवाया गया था, जिसमें राहुल गांधी को दो साल की सजा सुनाई गयी थी.

कांग्रेस नेता को सजा सुनाये जाने के बाद से ही कांग्रेस पार्टी लगातार केंद्र सरकार और भाजपा पर सवाल उठा रही थी. पार्टी का आरोप है कि ये सब कुछ जानबूझ कर करवाया गया है जिससे अडानी मुद्दे से लोगों का ध्यान हटाया जा सके. साथ ही ऐसा करके सरकार कांग्रेस को डरना चाहती है. हालांकि कांग्रेस नेताओं का ये दावा है कि वो ऐसी चालों से डरने वाले नहीं हैं. वहीँ तमाम राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसकी नींव तो पहले ही पड़ चुकी थी. दरअसल राहुल गाँधी की अति आक्रामकता और हर मुद्दे पर सीधे प्रधानमंत्री पर सवाल उठाया जाना भाजपा को रास नहीं आ रहा था.

  भारत जोड़ो यात्रा, अडानी पर सवाल और फिर कैम्ब्रिज दौरे के दौरान देश के आतंरिक मुद्दों पर प्रहार..बीते दिनों कांग्रेस नेता और सांसद राहुल गांधी इन बयानों के चलते चर्चा में रहे. उन पर कई आरोप भी लगे खास कर कैम्ब्रिज में दिए उनके वक्तव्य को लेकर. अपने कैम्ब्रिज दौरे के दौरान राहुल ने भारत में लोकतंत्र की ख़राब हो रही स्थिति, विपक्षी नेताओं की पेगासस से जासूसी, विपक्ष के नेताओं पर फर्जी मुक़दमे और मीडिया व न्यायपालिका की आवाज़ दबाये जाने का आरोप केंद्र सरकार पर लगाया था.

राहुल के इन आरोपों के बाद से ही सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी उनपर हमलावर थी. वो आरोप लगा रही थी कि  राहुल ने विदेशी धरती पर ऐसे मुद्दों को उठा कर देश का अपमान किया है. साथ ही भाजपा लगातार मांग कर रही थी कि राहुल गाँधी सदन में आकर बिना शर्त इसके लिए माफ़ी मांगे. इसी के चलते बजट सत्र के दूसरे चरण की शुरुआत से एक भी दिन सदन की कार्रवाई नहीं चल पाई. सदन शुरू होते ही हंगामे के चलते स्थगित होती रही. भाजपा सदन न चलने देने के लिए भी कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों को जिम्मेदार ठहरा रही है.

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उधर अडानी समूह के वित्तीय घोटाले को लेकर हिंडनबर्ग के खुलासे के बाद से ही पूरा विपक्ष एकमत हो मामले की जांच जेपीसी (संयुक्त संसदीय कमेटी) से कराये जाने की मांग कर रहा है. विपक्ष के साथ के चलते कांग्रेस इस मुद्दे पर बेहद आक्रामक नज़र आ रही थी. यही वजह थी कि राहुल और कांग्रेस बार-बार माफ़ी मांगने से इंकार करते रहे. इतना ही नहीं इस मामले में कांग्रेस भाजपा पर भरी भी दिख रही थी. वो हर बार सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए अडानी को बचाए जाने का आरोप लगा रही थी.

भारत जोड़ो यात्रा में राहुल गाँधी ने कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक जमीन को पैदल नापा. इस दौरान वे तमाम अलग-अलग लोगों से मिले. अमीर, गरीब, मजदूर, व्यापारी या नौकरी वाले लोगों की समस्यायों को मुखरता से उठाया. इसके चलते उनकी यात्रा को व्यापक जन समर्थन मिला. उत्साहित कांग्रेस ने ये दावा किया कि ये बदलाव की बयार है. आने वाले लोकसभा चुनाव में वो सत्तापरिवर्तन की नींव है. बाकि का काम किया विपक्षी एकता की गूंज ने. 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव में विपक्षी एकता को बढ़ा हथियार माना जा रहा था. भाजपा को हराने और सत्ता से हटाने का दावा किया जा रहा था.

पर बीते साल भाजपा के एक दांव के बाद से ही इस एकता में बिखराव की शुरुआत हो गई थी. ये दांव था आदिवासी समाज की महिला को देश का राष्ट्रपति बनाया जाना. विपक्षी एकता की कवायद को भाजपा के इस दांव के बाद सबसे पहले झटका दिया था प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बेनर्जी ने. ये झटका इसलिए भी ज्यादा बड़ा था क्योंकि उस समय ममता ही विपक्षी एकता की सबसे पड़ी पक्षधर थीं. फिर धीरे-धीरे विपक्षी एकता की कवायद कुंद होने लगी और तीसरे मोर्चे की बात भी शुरू हो गई. इस बीच अडानी समूह में हुए वित्तीय घोटालों के खुलासे के बाद विपक्ष फिर कांग्रेस के करीब आता दिख रहा था. हालाँकि टीएमसी, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी सहित कुछ दल अभी भी दूर ही दिख रहे थे.

राहुल गांधी को सजा फिर उनकी सदस्यता रद्द होने के बाद अब समीकरण फिर बदले हुए दिखने लगे हैं. राहुल जैसे नेता की सदस्यता ख़त्म होने के बाद तमाम विपक्षी दल उनके समर्थन में खड़े हो गये हैं. अरविन्द केजरीवाल, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, उद्धव ठाकरे, सीताराम येचुरी सहित कई नेताओं ने केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री पर सवाल उठाया. सभी नेताओं ने इसे बदले की कार्रवाई बताया है. वहीं भाजपा ने ऐसे आरोपों को सिरे से ख़ारिज कर दिया. बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने राहुल गांधी के बयान को पुरे ओबीसी समाज का अपमान करने वाला बताया तो विधि एवं न्याय राज्य मंत्री एस. पी. सिंह बघेल ने फैसले को न्यायसंगत बताते हुए कहा कि कानून के समक्ष सब बराबर हैं. राहुल गाँधी पर इस एक्शन ने विपक्षी नेताओं को एक बार फिर एक मंच पर लाने का रास्ता खोल दिया है. सांस छोड़ती विपक्षी एकता को नई उर्जा मिल गई है. उत्साहित कांग्रेस लड़ाई जारी रखने का दावा कर रही है. सोशल मीडिया पर डरो मत जैसे कैम्पेन चला रही है. अब देखना ये होगा कि राजनीतिक और रणनीतिक रूप से बेहद मजबूत भाजपा इस पूरे मुद्दे को कैसे अपने पक्ष में करती है?

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