नोट वापसी : रणनीति या भूल सुधार?

महज छ: साल में बंद हुए दो हज़ार के नोट, मोदी सरकार की भूल सुधार है या फिर रणनीति

अमिताभ नीलम, वरिष्ठ पत्रकारलखनऊ। देश अभी पिछली नोटबंदी के असर से पूरी तरह मुक्त भी नहीं हो पाया था कि भारतीय रिज़र्व बैंक ने शुक्रवार को 2000 रुपये के नोटों को वापस लेने की घोषणा की है। केन्द्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने इसे भ्रष्टाचार पर सर्जिकल स्ट्राइक करार दे रही है। कुछ बीजेपी नेताओं का कहना है कि ये नोटबंदी नहीं बल्कि नोट वापसी है। शुक्रवार को आरबीआई ने कहा है कि जो नोट बाज़ार में मौजूद हैं वो वैध रहेंगे। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार ने दो हज़ार रुपये के नोट वापस लेने का फ़ैसला क्यों किया है ये अभी स्पष्ट नहीं है।
ऐसे में ये सवाल उठना लाजमी है कि सरकार अभी कुछ साल पूर्व बाजार में उतारी करेंसी वापस क्यों ले रही है. ये एक सामान्य फार्मूला है कि जब देश में कालाधन जमा हो जाता है तो उसको बाहर निकालने के लिए सरकार और रिजर्व बैंक को देश हित में कुछ कड़े कदम उठाने पड़ते है जिसमें से नोटबंदी भी एक तरीका है। ऐसा कर पूँजीपतियों और साहूकारों की तिजोरी में जमा काला धन बाहर निकाल कर अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने को किया जाता है। यही प्रक्रिया 8 नवंबर 2016 को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अचानक उठाते हुए रु 500 और 1000 के नोटों को चलन से बाहर करने की घोषणा कर उन्हें अवैध घोषित कर दिया था। उस समय देश में अफरा तफरी मच गयी थी। बड़ी संख्या में लोग नोट बदली के दौरान मर भी गये थे। उसी समय अर्थव्यवस्था में हुई मुद्रा की कमी को तेज़ी से भरने के लिए 2000 के नोट रिजर्व बैंक ने जारी किये थे। पर इस बार की नोट बदली पिछली नोटबंदी से अलग है। इसका आम आदमी पर पहले जैसा असर देखने को नहीं मिलेगा।
देखा जाए तो आज की तारीख में आम लोगों में 2000 के नोटों का चलन पहले से काफी कम है। पिछले चार वर्षों से दो हजार के नोट न तो एटीएम दे रहा था और न ही बैंक। सो आम आदमी तो प्रभावित होने से रहा। हांए किसी ने दबाकर यदि दस बीस या पचास नोट भी रख रखें हैं तो पर्याप्त समय है ही बदलवा लेने काए चाहे तो दो चार बार में बदलवा ले या पूरे एक साथ ही अपने खाते में डाल दे।लेकिन विगत एक वर्ष से बाज़ार से 2000 के नोट चलन से लगभग गायब हो पूंजी पतियों और साहूकारों की तिजोरी की शोभा बढ़ा रहे थे। इन नोटों को बाहर निकालने के लिए रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने गत शुक्रवार शाम अचानक 2000 के नोटों को वापस लेने की घोषणा कर दी है। 2000 हज़ार के नोट को चलन से बाहर किए जाने की घोषणा ने जहाँ एक तरफ अधिकांश लोगों की दिलों की धड़कन बढ़ाई वही 8 नवंबर 2016 की नोटबंदी के स्याह पहलू की याद ताज़ा कर दी है। राजनीतिज्ञों में आरोप .प्रत्यारोप के दौर जारी हैं। हालाँकि यह नोट अभी वैध मुद्रा है। लेनदेन में मान्य है।
रिजर्व बैंक ने बैंकों के माध्यम से 2000 के नोटों को बदलने के लिए 23 मई से 30 सितम्बर तक की तारीख निश्चित की है। उसके बाद यह नोट चलन से बाहर कर दिए जायेंगे। इसे नोट बंदी नहीं माना जाना चाहिए। यह नोटबंदी नहीं है। 2000 के नोट पूरी तरह से मान्य रहेंगे। बस इन्हें सिस्टम से हटाने के लिए वापसी की जा रही है। ज्ञात हो कि 8 नवंबर 2016 को अचानक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में छुपे काले धन को बाहर निकालने के लिए 500 और 1000 के नोटों को तत्काल प्रभाव से बंद करने की घोषणा करते हुए अवैध मुद्रा घोषित कर दिया था। देश में बड़ा अफरा तफरी का माहौल बन गया था। हालाँकि तब भी प्रधानमंत्री ने इसका मकसद नोटों को वापस लेना ही बताया था। तब विपक्ष ने काफी हंगामा खड़ा किया था। बल्कि इस नोट बंदी को अवैध करार देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर हुई थी लेकिन कोर्ट ने नोट बंदी को वैध करार देते हुए सरकार के पक्ष में निर्णय दिया था। ये एक सर्वमान्य तथ्य है कि बड़े मूल्य के नोटों का इस्तेमाल धन को अवैध तरीके से जमा करने के लिए किया जाता है। सो काले धन का मुकाबला करने के लिए उच्च मूल्य के नोटों को चलन से हटाना उचित है। और ऐसा कई देशों द्वारा किया जाता रहा है। परन्तु सवाल गंभीर है कि क्या इस कदम से वास्तव में ब्लैक मनी को समाप्त करने का उद्देश्य पूरा होगा?

पिछले दिनों ही एक राज्य के मंत्री के पास से पचास करोड़ की बरामदगी में अधिकांश 2000 के पिंक नोट ही पाये गये थे। नवंबर 2016 में 2000 के नोटों की शुरुआत इस मक़सद से की गयी थी कि 500 और 1000 के नोटों की वापसी के बाद अर्थव्यवस्था में मुद्रा की जरुरत को तेजी से पूरा किया जा सके। मुद्रा की जरुरत पूरी होने और पर्याप्त मुद्रा में बाजार में नई मुद्रा उपलब्धता के बाद वर्ष 2018-2019 में 2000 के नोटों की छपाई बंद कर दी गई थी।

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साल 2016 की नोटबंदी का क्या पड़ा था असर?

देश में अचानक नोटबंदी के ऐलान के बाद लोगों में नोट बदलने को लेकर होड़ मच गई थी । बैंकों के बाहर लंबी-लंबी लाइनें देखने को मिली । आरबीआई भी इतने बड़े पैमाने पर नोटों की बदली के लिए तैयार नहीं था। जिसके कारण अचानक से मार्केट में नोट की कमी हो गई थी। इसके साथ ही एटीएम के बाहर भी लोग घंटों तक लाइन में खड़े होकर पैसे निकालने के लिए परेशान हुए थे। इस दौरान कई लोगों की मौत की खबरें भी सामने आई थीं। नोटबंदी के 7 साल बाद मार्च 2023 में जब के टीएमसी सदस्य अबीर रंजन बिस्वास ने सरकार से पूछा था कि साल 2016 में हुई नोटबंदी के कारण कुल कितने लोगों की मौत हुई थी? इस सवाल के जवाब में सरकार ने कहा था कि उनके पास इसे लेकर कोई डाटा नहीं है। वहीं साल 2018 में उस समय के तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने संसद में इसी तरह के सवाल का जवाब देते हुए जानकारी दी थी कि नोटबंदी के कारण देश में चार लोगों की मौत हुई थी। सरकार को नोटबंदी के फैसले के बाद नोटों की साइज में बदलाव के कारण एटीएम को भी बदलना पड़ा था।

1000 रुपए का नोट करेगा कमबैक?

अब सवाल है कि क्या 1000 रुपए का नोट कमबैक करेगा? ऐसा मुमकिन भी है और नहीं भी ! दरअसलए बड़े लेन-देन और दूसरे राज्यों और देशों के साथ ट्रेड में बड़ी करेंसी की जरूरत होती है। पहले 1000 रुपए का नोट यही काम करता था। लेकिनए फिर 2000 रुपए का नोट आया। इसने बड़े लेन-देन और आसान बना दिया। अब जब 2000 रुपए का नोट बंद हो रहा है तो ये कहना गलत नहीं कि 1000 रुपए के नोट की जरूरत पड़ेगी। ऐसी स्थिति में रिजर्व बैंक एक बार फिर इसे लाने का विचार कर सकता है। हालांकि ये पूरी तरह से केंद्र सरकार पर निर्भर करता है। सरकार के सलाहकार इस पर क्या सलाह देते हैं ये अभी कहना जल्दबाजी होगा। आजादी के पूर्व भी हुई थी नोटबंदी आजादी से पूर्व भी कालाबाजारी पर रोक लगाने के उद्देश्य से 11 जनवरी 1946 को भी तत्कालीन सरकार ने 12 जनवरी 1946 में रूपये 500, 1000 तथा 10000 के नोटों को अवैध मुद्रा करार देते हुए नोटबंदी की घोषणा की थी। जनता पार्टी की सरकार ने भी की थी नोट बंदी 16 जनवरी 1978 कोए जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार ने काले धन को समाप्त करने के लिए 1,000 रुपये, 5,000 रुपये और 10,000 रुपये के नोटों का विमुद्रीकरण किया। एच एम पटेल ने नोटबंदी को बेकार नहीं बताया था।

हालाँकि उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के निर्देश पर विमुद्रीकरण लागू करने से कुछ साल पहले इस प्रक्रिया को ‘उपयोगी नहीं’ करार दिया था। गुजराती पत्रिका ष्निरीक्षकष् के अक्टूबर 1972 के अंक में एक लेख में श्री पटेल ने अघोषित धन की वृद्धि के लिए तीन योगदान कारकों उच्च कर दरों, नियंत्रण और भ्रष्टाचार को सूचीबद्ध किया था ।उन्होंने कहा कि जब तक इन्हें दुरुस्त नहीं किया जाता ष्छाया से जूझने का कोई मतलब नहीं है। 16 जनवरी 1978 को मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली सरकार ने 1,000 रुपयेए 5,000 रुपये और 10,000 रुपये के नोटों का विमुद्रीकरण किया था, जो कि बड़े पैमाने पर अमीरों के पास थे। तब एक अध्यादेश जारी किया गया था और आकाशवाणी के 9 बजे के समाचार बुलेटिन के माध्यम से इसकी घोषणा की गई थी।

राजनीतिक पार्टियों ने शुरू की सरकार की आलोचना
नागरिक एकता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मो० शमीम खान ने जारी एक प्रेस नोट में कहा है कि जब सत्ताधारी मोदी सरकार ने देश में नोटबंदी कर अपने तानाशाही रवैये को अपनाते हुए 2000 रू और 500 रू के नोट जारी किया था तो यह कहा था कि इससे कालेधन व कालेधन वालों पर रोक लगेगी। उस समय जनता को अपने नोटों को बदलवाने के लिए बैंकों में लम्बी लम्बी कतारों में लगना पड़ा था जिससे आम जनमानस को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था और न जाने कितने लोगों की इसमें जान तक चली गई थी। आज एक बार फिर जब 2024 के चुनाव का समय नजदीक आ रहा तो वही तानाशाही सरकार को अपनी हार का डर सताने लगा है। इसलिए मोदी सरकार द्वारा अपनी ही सरकार में चलाई गई 2000 रुपये की नोटों को बंद करने का फैसला लेकर बीजेपी ने यह साबित कर दिया कि उन्हें न ही देशहित में और न ही जनमानस हित में फैसला लेना नहीं आता है। इससे पहले भी इस केंद्र सरकार द्वारा द्वारा कृषि बिल लाया गया था जिसे बाद में वापस लेना पड़ा था। मैं केंद्र सरकार से पूछना चाहता हूँ कि 2000 रूपए के नोटों की छपाई में जो देश की जनता का पैसा बर्बाद हुआ है उसकी भरपाई आप कहाँ से करोगे? क्या जनता हमेशा यूं महंगाई में पिसती रहेगी? आज देश में महंगाई अपने चरम पर पहुँच गई है। जिसके पीछे का एक कारण नोटबंदी भी है।
2000 के नोट के बहाने कांग्रेस ने भी साधा सरकार पर निशाना
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा 2,000 रुपये के नोट को सितंबर 2023 के बाद चलन से बाहर करने की घोषणा किए जाने के बाद गत शनिवार को केंद्र पर निशाना साधा और सवाल किया कि क्या नोटबंदी रूपी गलत निर्णय पर पर्दा डालने के लिए यह ‘दूसरी नोटबंदी’ की गई है। उन्होंने कहा कि एक निष्पक्ष जांच से ही पूरी सच्चाई सामने आएगी।खरगे ने ट्वीट किया ‘आपने पहली नोटबंदी से अर्थव्यवस्था को एक गहरा जख्म दिया था। जिससे पूरा असंगठित क्षेत्र तबाह हो गया। एमएसएमई,सूक्ष्म व लघु एवं मध्यम उद्यमद्ध ठप हो गए और करोड़ों रोजगार गए। अब 2,000 रुपये के नोट वाली ‘दूसरी नोटबंदी’ क्या यह गलत निर्णय के ऊपर पर्दा डालना है? एक निष्पक्ष जांच से ही कारनामों की सच्चाई सामने आएगी।

सांसद, उप नेता राज्य सभा एवं सदस्य कांग्रेस स्टीयरिंग कमेटी प्रमोद तिवारी ने कहा है कि भारत का इतिहास जब याद किया जाता है तो याद आता है कि एक समय गयासुद्दीन तुगलक शाह ने दिल्ली स्थित अपनी राजधानी तुगलकाबाद लाये और आर्थिक तथा प्रशासनिक सैनिक तबाही एवं बर्बादी के बाद उसने अपनी राजधानी दक्षिण के औरंगाबाद जिले के दौलताबाद देवगिरी में स्थानांतरित किया किन्तु वहां भी तमाम तरह की परेशानियों एवं जनसाधारण की गम्भीर समस्याओं के कारण दोबारा फिर वह दिल्ली वापस लौट आयाए और उसने अपनी राजधानी दिल्ली को बनायाए उसकी सल्तनत की जनता ने भारी आर्थिक और प्रषासनिक परेषानी उठायी। यही नहीं गयासुदद्दीन तुगलक शाह ने उस चलन में रहे सोने एवं चांदी के सिक्के को बन्द करके तांबे का सिक्का चलाया किन्तु बाद में उसे बन्द करना पड़ा । इसीलिये आज भी बिना किसी आधार के बिना किसी तर्क के जो फैसले लिये जाते हैं उन्हें तुगलकी फरमान कहा जाता है । आज एक बार फिर पुराने इतिहास दोहराते हुये मोदी सरकार द्वारा एक तुगलकी फैसले से देश की अर्थव्यवस्था को तबाह और बर्बाद किया जा रहा है। आने वाला इतिहास मोहम्मद बिन तुगलक को भूल जायेगाए और मोदी सरकार को याद रखेगा, क्योंकि जिस तरह मोहम्मद बिन तुगलक ने अपनी भूल को मानते हुये पुनः अपनी राजधानी दिल्ली वापस लाया तथा अपने ही द्वारा जारी किये गये तांबे के सिक्के को बन्द करना पड़ा। उसी तरह मोदी सरकार पहले तो 1000 रुपये और 500 रुपये के नोट बन्द करके 2000 का नोट लायी और फिर उसने 2000 रुपये के नोट बन्द करने का फैसला ले लिया।

नवम्बर, 2016 में मोदी सरकार ने उस समय के 1000 (एक हजार) और 500 (पांच सौ) के नोट बन्द करके आरबीआई ऐक्ट 1934 की धारा 24(1) के तहत नवम्बर 2016 में 2000 रुपये (दो हजार रुपये) के नोट जारी किये थे। श्री तिवारी ने कहा है कि 6 साल 6 माह में ही मोदी सरकार ने नवम्बर, 2016 के अपने फैसले को पलटते हुये अपने ही कार्यकाल में कल दिनांक, 19 मई, 2023 को अपना फैसला बदल दियाए और अपने ही कार्यकाल में नवम्बर 2016 में जारी की गयी 2000 रुपये की नोट को वापस ले लिया और एलान कर दिया कि 30 सितम्बर, 2023 के बाद ये लीगल टेण्डर नहीं रहेंगे। यानी मोदी सरकार ने मान लिया है कि नवम्बर 2016 का उसका निर्णय गलत था। एक बार फिर अनिश्चितता का दौर शुरू हो गया है। देश में पूंजी निवेश खतरे में पड़ जायेंगे। जिस किसी ने योजना बनायी होगी अपने उद्योग, व्यापार या निवेश के लिये उसका क्या होगा घ् और उन्हें कितनी परेशानी होगी। श्री तिवारी ने कहा है कि पहले तो मोदी सरकार ने ताल ठोंकी थी और जुमला बोला था कि जो लोग गद्दे में नोट रखकर सोते हैं या जिनके पास ब्लैक मनी, कालाधन है, वह सब नोट बन्दी से बाहर निकल आयेगी । किन्तु जब ९९ प्रतिशत से अधिक धनराशि बैंकों में डिपाॅजिट हो गयी तो यह स्पष्ट हो गया कि देश में ब्लैक मनी कालाधन नहीं है । और यदि है तो उसे सरकार, बैंक या बिचैलियों के गठबन्धन ने  ब्लैक से व्हाईट (काले से सफेद) बना लिया है।
यानी पूंजीपतियों, बिचैलियों और सरकार के गठबन्धन ने उसे व्हाइट बना दिया। मोदी सरकार की नीति या तो तब गलत थी या फिर अब गलत है। इन 6 साल 6 माह में ही आदरणीय मोदी जी की आर्थिक नीति का फैसला पूरी तरह गलत साबित हो गया ।

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी आरबीआई के 2000 के नोट को चलन से बाहर करने पर तंज कसा है उन्होंने कहा कि कुछ लोगों को अपनी गलती देर से समझ में आती है। इस पर भाजपा ने चुटकी लेते हुए कहा कि जितनी कटु आलोचना समझिए उतना ज्यादा नोटों का जखीरा।
भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता नवीन श्रीवास्तव ने राजनीतिक पार्टियों के नेताओं द्वारा आरबीआई के 2000 के नोटों को वापस लेने और चलन से बाहर किए जाने की घोषणा के बाद आए बयानों पर चुटकी ली और कहा कि 2000 के नोटों की वापसी से आम जनमानस को कोई दिक्कत नहीं है। दिक्कत सिर्फ उन्ही को है जिन्होंने पिछली नोट बंदी में अपने पास जमा काले धन को किसी माध्यम से 2000 के नोटों में बदल कर जमा कर लिया था अब उनकी वापसी से उनमें बेचैनी बढ़ गयी है जो उनके बयानों में परिलक्षित हो रही है। जो जितनी कटु आलोचना कर रहा समझिए उतना ज्यादा नोटों का जखीरा।

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