
उत्तर प्रदेश की सियासी दलों में इन दिनों प्रयागराज और कौशांबी के मामले ने सियासत को गरमा दिया है। प्रयागराज में एक दलित युवक की हत्या के बाद उसके आरोपी जेल भेजे जा चुके है। जबकि कौशांबी में बच्ची से रेप के मामले में पुलिस की चूक ने मामले को ब्राह्मण बनाम पाल कर दिया है। दोनों मामले में सत्ताधारी दल को छोड़कर अन्य राजनैतिक दल के नेताओं को जातिगत आधारित वोट के राजनीति नज़र आ रही है। जिसके चलते पहले सपा फिर बसपा, कांग्रेस और फिर आज़ाद समाज पार्टी चीफ सांसद चन्द्रशेखर ने दोनों परिवार के मुलाक़ात करने के बहाने सियासी पारे को चढ़ा दिया है।
आइए अब आपको सबसे पहले दोनों घटनाक्रम अलग अलग पढ़ाते है..

पहला मामला प्रयागराज के करछना इलाके का है, जहां 13 अप्रैल को दलित युवक देवी शंकर की हत्या कर दी गई। पुलिस ने हत्या के पीछे ‘लव अफेयर की रंजिश’ बताई है। देवी शंकर गांव के ही दबंग अवधेश सिंह उर्फ डीएम के परिवार की लड़की से फोन पर बात करता था। इसी बात पर 12 अप्रैल की रात दिलीप सिंह उर्फ छुट्टन ने उसे घर से बुलाया। शराब पार्टी के बहाने पांच घंटे तक चले झगड़े के बाद आठ लोगों ने मिलकर देवी शंकर को बेरहमी से पीट-पीट कर मार डाला और फिर लाश को जला दिया। तेज हवाओं से आग बुझ गई और अधजली लाश मिलने के बाद गांव में बवाल मच गया। गुस्साए लोगों ने आरोपियों के घरों में तोड़फोड़ की और पुलिस को शव उठाने नहीं दिया। विरोध बढ़ने पर प्रशासन ने 1.5 बीघा सरकारी ज़मीन पर आरोपियों के कब्जे को बुलडोजर से ढहा दिया। इस कार्रवाई के बाद दलित उत्पीड़न के आरोप लगने लगे और मामला राजनीतिक रंग लेने लगा। इसमें अलग-अलग दिन समाजवादी पार्टी के स्थानीय नेताओं के साथ प्रदेश अध्यक्ष श्याम लाल पाल ने पीड़ित परिवार से मिलकर आर्थिक मदद दी और इंसाफ दिलाने का भरोसा जताया। इसके बाद बसपा प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने भी पीड़ित परिवार के घर जाकर प्रदेश की कानून व्यवस्था और दलित उत्पीड़न का मुद्दा उठाया। इसे लेकर करछना थाना पुलिस समेत प्रयागराज पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगने लगे। किरकिरी से बचने के लिए पुलिस अधिकारियों ने गांव और पीड़ित परिवार के पास जाने वाले नेताओं पर रोक लगा दी।
दूसरा मामला कौशांबी जिले के लोहदा गांव का है, जहां पाल समाज की 8 साल की बच्ची से दुष्कर्म हुआ। आरोपी सिद्धार्थ जेल भेजा गया, लेकिन इस बीच उसके पिता रामबाबू ने थाने के बाहर ज़हर खाकर जान दे दी। इसके बाद आरोपी परिवार ने सड़क पर हंगामा किया और पुलिस से भिड़ गए। हालात बेकाबू होने पर पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा। इसी दौरान डिप्टी सीएम बृजेश पाठक के सोशल मीडिया पोस्ट से जांच की दिशा बदल गई। आनन-फानन में सैनी थानेदार समेत दो दारोगा सस्पेंड कर दिए गए। अपनी कुर्सी बचाने के लिए अफसरों ने तत्कालीन एसआईटी प्रमुख रहे सर्किल अफसर का सर्किल भी बदल दिया। पीड़िता के पिता को अब आरोपी के पिता की मौत के मामले में जेल भेजा गया है, जबकि गांव के प्रधान भूप नारायण पाल को एसपी ने 25 हजार रुपये का भगोड़ा अपराधी घोषित कर दिया। हालांकि हाईकोर्ट से प्रधान को गिरफ्तारी से राहत मिली है। मामले में कौशांबी पुलिस की किरकिरी हुई और अब पूरे मामले की जांच एसआईटी प्रतापगढ़ को सौंप दी गई है, जिसकी मॉनिटरिंग प्रयागराज के आईजी प्रतिदिन कर रहे हैं।
इन दोनों मामलों ने प्रदेश में दलित उत्पीड़न और पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इन्हीं सवालों को मुद्दा बनाकर सपा-बसपा-कांग्रेस के बाद आज़ाद समाज पार्टी के नेता व सांसद चंद्रशेखर आज़ाद भी दोनों परिवारों से मिलकर अपनी सहानुभूति जताना चाहते थे, लेकिन उन्हें प्रयागराज सर्किट हाउस में ही नजरबंद कर दिया गया।
अब प्रयागराज और कौशांबी के दलित और पिछड़े वोट बैंक के समीकरण पर नज़र डालें — प्रयागराज दो संसदीय क्षेत्रों में बंटा है— पहला प्रयागराज और दूसरा फूलपुर। प्रयागराज संसदीय सीट में 3.15 लाख और फूलपुर में 2.65 लाख दलित वोटर बताए जा रहे हैं। खासकर करछना की बात करें तो कुल 3.3 लाख वोटर्स में 48 हजार से ज्यादा दलित वोटर हैं, यानी कुल वोटरों का करीब 12 फीसदी हिस्सा। ऐसे में अगर दलित वोटर सत्ताधारी दल से नाराज़ होता है तो क्षेत्रीय दलों के नेताओं की राजनीति मजबूत होगी।
इसी तरह कौशांबी में महज 8 साल की बच्ची से दुष्कर्म के बाद पुलिस की चूक ने सियासी दलों को बड़ा मौका दे दिया है। इस संसदीय सीट पर पहले भाजपा के विनोद सोनकर सांसद थे, जो दो बार से जीतते आ रहे थे। पार्टी ने उन्हें बड़ा दलित चेहरा बनाने की कोशिश की और अनुसूचित मोर्चा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया, लेकिन इस बार पीएम का मैजिक भी उन्हें जीत नहीं दिला सका। इस सीट पर सपा के युवा नेता पुष्पेंद्र सरोज सांसद बन गए। दलित बहुल कौशांबी की सुरक्षित सीट के अलावा विधानसभा सीट भी समाजवादी पार्टी के खाते में चली गई। अकेले सिराथू विधानसभा में कुल 3.65 लाख वोटरों में एससी वोटर 45 फीसदी, पिछड़ा वर्ग 24 फीसदी और मिश्रित वर्ग के 32 फीसदी वोटर हैं। इसमें पाल समाज के 25 हजार और ब्राह्मण समाज के करीब 70 हजार वोटर हैं। अगर पूरे जिले की बात करें तो ब्राह्मण करीब 2 लाख और पाल समाज के करीब 70 हजार वोटर हैं। ऐसे में राजनीतिक दल कानून-व्यवस्था को मोहरा बनाकर जातीय गणित साधने की कोशिश में सियासत की रोटियाँ सेंकने से बाज नहीं आ रहे हैं।
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Village Post